बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने लखनऊ में शनिवार को साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान दोनों दलों ने आगामी लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ने का औपचारिक ऐलान किया. मायावती ने कहा कि बसपा आगामी लोकसभा चुनावों में एक बार फिर सपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है. आने वाले समय में इस गठबंधन को एक प्रकार से नए राजनीतिक क्रांति का समय माना जाएगा. इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने एक सवाल के जवाब में कहा कि सपा और बसपा का गठबंधन स्थायी है. गठबंधन सिर्फ 2019 का आम चुनाव ही नहीं बल्कि 2022 का विधानसभा चुनाव भी साथ लड़ेगा. हालांकि जब यही सवाल अखिलेश यादव से किया गया तो उन्होंने कहा कि अभी यह गठबंधन अगले लोकसभा चुनाव के लिए तय किया गया है.

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए गठबंधन का ऐलान करते हुए मायावती ने कहा कि यूपी में सपा-बसपा 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. उन्होंने यह भी कहा कि यह गठबंधन अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा. जबकि 2 सीटें सहयोगियों के लिए छोड़ी जाएंगी. बता दें कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं.

मायावती ने कहा, ‘4 जनवरी को दिल्ली में एक बैठक हुई थी. उसी बैठक में दोनों दलों ने गठबंधन में चुनाव लड़ने का फैसला किया था. हमने प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर गठबंधन कर लिया है. इसकी भनक शायद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को लग गई थी, जिसकी वजह से हमारे सहयोगी अखिलेश यादव की छवि धूमिल करने के लिए जबरन उनका नाम खनन घोटाले में घसीटा गया.’

गठबंधन में क्यों नहीं कांग्रेस

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने कांग्रेस को गठबंधन में शामिल नहीं करने का कारण भी बताया. उन्होंने बताया कि कांग्रेस के राज में घोषित इमरजेंसी थी और अब (मोदी सरकार में) अघोषित. सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर प्रभावी विरोधियों के खिलाफ गड़े मुकदमे उखाड़ कर परेशान कर रहे हैं. कांग्रेस के साथ सपा-बसपा गठबंधन का कोई खास फायदा नहीं होता. हमारा वोट तो ट्रासंफर हो जाता है, लेकिन कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता है या अंदरूनी रणनीति के तहत कहीं और ट्रांसफर करा दिया जाता है.

मायावती जी का अपमान मेरा अपमानः अखिलेश

वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा, ‘गठबंधन का मन तो उसी दिन बन गया था जिस दिन बीजेपी के नेताओं ने मायावती जी पर अशोभनीय टिप्पणी की थी और बीजेपी ने अपने नेताओं पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मंत्री बनाकर इनाम दिया था. बीजेपी ने अपने अनुशासनहीन नेताओं को दंडित करने के बजाय उन्हें बड़े-बड़े मंत्रालय देकर सम्मानित किया.’ सपा मुखिया ने कहा, ‘गठबंधन का मन उसी दिन पक्का हो गया था, जब राज्यसभा में भीमराव अंबेडकर को छल से हराया गया था. मायावती जी का धन्यवाद कि उन्होंने बराबरी का मान दिया. आज से मायावती जी का अपमान मेरा अपमान होगा.’

बता दें कि 1993 का विधानसभा चुनाव भी बसपा और सपा मिलकर लड़ चुकी हैं. गठबंधन ने 4 दिसंबर 1993 को सत्ता की कमान संभाल ली. लेकिन, 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा कर लिया और समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.

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